गणगौर की कहानी – Gangaur ki Kahani

गणगौर की कहानी – Gangaur ki Kahani

Gangaur ki kahani

Gangaur ki Kahani – चैत्र का महीना आया। पार्वती को भाभी के उद्यापन के लिए पीहर जाना था तो महादेव जी बोले हम भी तुम्हारे साथ चलेंगे तो ईसर गौरांदे नंदी को साथ लेकर निकले। महादेव जी नंदी पर बैठे और पार्वती जी पैदल चलने लगी तो लोग कहने लगे देखो आदमी तो सवारी पर बैठा है और औरत को पैदल चला रहा है। तो फिर महादेव जी उतरे और पार्वती को नंदी पर बैठाया। ये देख लोग कहने लगे , देखो रे औरत तो सवारी पर चल रही है और पति पैदल चल रहा है। ऐसा सुन कर पार्वती भी उतर गयी और अब महादेव जी और पार्वती दोनों पैदल चलने लगे साथ में नंदी भी चलने लगा। अब लोग बोले देखो वाहन होते हुए भी दोनों पैदल चल रहे है , तो फिर ईसर गौरांदे दोनों नंदी पर बैठ गए। फिर लोग बोले देखो छोटे से जीव पर दोनों जने बैठे है। पार्वती बोली – भगवान ये दुनिया कैसी है ? नंदी पर बैठने भी नहीं देती और पैदल चलने भी नहीं देती। ईसर जी बोले , पार्वती यही संसार है। यहाँ ऐसा ही होता है।

आगे गए तो एक गाय उठती बैठती बैचैन हो रही थी। गौरा दे पूछने लगी , भगवान ये गाय कष्ट में क्यू है ? तो ईसर जी बोले – इसके बछड़ा होने वाला है। गौरांदे बोली – बच्चे के लिए इतना कष्ट मुझसे तो सहन नहीं होगा मेरे तो गाँठ दे दो। ईसर जी बोले आगे चलो। आगे गए तो गोड़ी उठ बैठ करते हुए दिखी। गौरांदे बोली इस गोड़ी को क्या कष्ट है ? तो ईसरजी बोले – इसके बच्चा होने वाला है। गौरांदे बोली मुझसे इतना कष्ट सहन नहीं होगा आप मेरे तो गाँठ दे दो। ईसर जी बोले आगे चलो। आगे गए तो राजा की नगरी में उदाशी छायी हुई थी। ढोल नगाड़े उलटे थे। गौरांदे पूछने लगी – यहाँ सभी उदाश क्यों है ? ईसरजी बोले यहाँ रानी के कंवर होने वाला है। अब तो गौरांदे जी माने ही नहीं और बोले बच्चे के लिए इतना कष्ट हो तो मुझे बच्चे नहीं चाहिए। आप मेरे गांठ दे दो। ईसर जी को गाँठ देनी पड़ी। ईसरजी ससुराल पहुंचे। पीपल के पेड़ के निचे वास किया।

गौरांदे पीहर में सहेलियों में मग्न हो गयी गणगौर नजदीक आई। ईसरजी बोले आज गणगौर है सभी औरते पूजा करने आएगी। सवेरे से ही स्त्रियाँ पूजा करने आने लगी। गौरांदे जी भी सभी को सुहाग बाँटने लगी। दोपहर के समय बनियो की औरते ओढ़ पहन कर सोलह श्रृंगार करके पूजा करने गीत जाती हुई आई। गौरांदे बोली सुहाग तो सारा बाँट दिया। ये औरते तो अब आई है। ईसर बोले गौरांदे चिट्टी उंगली जल में धोओ, नैनो का सुरमा निकालो , मांग से सिंदूर निकालो , टिकी में से रोली निकालो और सभी स्त्रियों को अमर सुहाग दो। गौरांदे ने ईसर जी के कहे अनुसार सबको अमर सुहाग दिया। अब ईसर गौरांदे जी घर आये। ईसर जी जीमने बैठे जितना भी बनाया सब जिम गए। अब गौरांदे जी जीमने बैठी तो माँ बोली – बेटी में थोड़ा और भोजन बना देती हूँ , तो बेटी बोली – माँ में तो बेटी हूँ कुछ भी खा लुंगी और गौरांदे जी ने जला बाट्या और बथुए की पिंडी खाकर , लोटे भर पानी पी लिया। माँ ने सीख दी। वहाँ से निकल कर ईसर गौरांदे जी पीपल के नीचे आये। ठंडी छाँव में थकी हुई पार्वती जी को नींद आ गयी। ईसर जी ने पार्वती जी के पेट की ढकनी खोली , देखा तो जला हुआ बाट्या व बथुए की पिंडी थोड़े से पानी के साथ पड़ी थी।

ईसर जी ने ढकनी वापस ढक दी। पार्वती जी जागे तो ईसर जी ने पूछा , गौरांदे क्या क्या जीमा ? गौरांदे बोली ईसर जी जो के अलावा थोड़ा सा जल है। गौरांदे बहुत नाराज हुई और बोली देखो भगवान आज तो आपने मेरी पेट की ढकनी खोली है लेकिन ऐसा जगत के साथ मत करना। पीहर की बात ससुराल में और ससुराल की बात पीहर में नहीं करनी चाहिए। पार्वती इतना बोली और फिर ईसरजी और गौरांदे वापस कैलाश पर्वत के लिए रवाना हुए। आगे देखा तो राजा के यहाँ शहनाहिया बज रही है , प्रजा खुशियां मना रही है। रानी भी बहुत खुश है। गौरांदे बोली कुंवर होने पर इतनी ख़ुशी होती है। आप तो कृपा करके मेरी गाँठ वापस खोल दो। ईसरजी बोले – मैंने पहले ही कहा कहा था मेरी गाँठ खोले नहीं खुलेगी। आगे चले तो देखा गोड़ी के भी बच्चा हो गया वह अपने बच्चे को प्यार से चाट रही थी और बहुत प्रसन्न थी। पार्वतीजी बोली – भगवान आप मेरी गाँठ खोलदो। महादेव जी बोले गाँठ नहीं खुलेगी। फिर और आगे गए और देखा की गाय के भी बछड़ा हो गया और गाय अपने बच्चे को प्यार से चाट रही थी और बहुत खुश हो रही थी। और उस गाय की मालकिन भी बहुत खुश हो रही थी। पार्वतीजी सोची जब जानवरो को अपने बच्चो की इतनी उमंग है तो मानव की तो बात ही क्या है ? और ईसर जी से बोली मेरी गाँठ खोलो नहीं तो में यहाँ से एक कदम भी आगे नहीं चलुगी। पर ईसरजी बोले अब कुछ नहीं हो सकता है।

थोड़े दिन बीते और पार्वतीजी ने अपने मैल का पिंड बनाया और उसमे प्राण फुके। उस बालक को रखवाली रख के पार्वतीजी स्नान को गयी। भगवान आये अंदर जाने लगे लेकिन बालक ने अंदर नहीं जाने दिया, तो भगवान ने पूछा तुम कौन हो ? बालक बोलै मै पार्वती पुत्र हूँ। भगवान ने सोचा ये पुत्र कहा से आया ? और त्रिशूल से उस बालक का गला काट दिया। माँ पार्वती आई और देखा और भगवान से कहा मेरे पुत्र को जीवित करो। तो शिवजी ने गणो को भेजा की जो कोई स्त्री अपने पुत्र से विमुख होकर (पीठ दिखाकर ) सो रही हो , उसी बच्चे का सिर काट कर ले आओ। गण सभी जगह घूमते घूमते जंगल में पहुंचे जहा एक हथिनी अपने बच्चे से विमुख होकर सो रही थी। गण उसका सिर काट लाये। भगवान ने उस सिर को बालक के शरीर पर जोड़ दिया और अमृत का छींटा दिया और बोले दुनिया में सबसे पहले गौरी पुत्र गणेश की पूजा होगी बाद में दूसरे देवी देवता की पूजा होगी। खोटी री खरी अधूरी री पूरी। है गणगौर माता , हम सबको अमर सुहाग देना।

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