वैशाख संकष्टी चतुर्थी : Vaishakh Sankat Chauth Vrat Katha

वैशाख संकष्टी चतुर्थी : Vaishakh Sankat Chauth Vrat Katha

vaishakh sankat chauth vrat katha

Vaishakh Sankat Chauth Vrat Katha : एक गाँव में सेठ , सेठानी रहते थे। उनके एक बेटा बहु थे। बहु बर्तन मांजकर पानी डालने निचे जाती तो अड़ोस – पड़ोस की औरते उससे पूछती आज खाने में क्या खाया ? तो वह कहती – “बासी कुसी तर बासी “। एक दिन जब वह बर्तन मांजकर पानी फैकने गयी तो रोजाना की तरह औरतो ने पूछा की आज क्या खाया तो फिर उसने यही जवाब दिया “बासी कुसी तर बासी “। उस दिन सेठ के बेटे ने निचे उतरते हुए उसकी यह बात सुनली और मन में सोचने लगा की अभी तो यह ताज़ा भोजन करके आई है फिर भी इसने दुसरो को बासी कुसी क्यों बताया। दूसरे दिन उसने माँ से कहकर खीर खांड का भोजन बनवाया। माँ , बेटा और बहु तीनो ने बड़ी प्रसन्नता से भोजन किया। बहु बर्तन मांजकर पानी को नीचे डालने गयी तो पीछे पीछे उसका आदमी भी गया। आज भी हमेशा की तरह औरते ने पूछा तो उसने वही जवाब दिया “बासी कुसी तर बासी “। उसके आदमी की बहुत गुस्सा आया। आज तो मेरे सामने खीर खांड का भोजन किया है फिर भी यह बसी कुसी बता रही है। इसमें क्या रहस्य है ? इस बात को समझने के लिए वह रात का इन्तजार करने लगा। जब रात हुई और बहु कमरे में आई तो उसके आदमी ने पूछा की आज तो तूने खीर खांड का भोजन किया फिर भी पडोसी की औरतो को बासी कुसी क्यों बताया ? तब बहु मुस्कराकर बोली की ना आप कमाओ ना आपका बाप कमाए। ये तो दादा परदादाओ की कमाई है , तो यह बासी कुसी हुई या नहीं ? यह सुनकर उस आदमी ने परदेश जाने की सोच ली और सुबह उठकर माँ से बोला माँ में कमाने के लिए परदेस जा रहा हूँ। माँ ने कहा अपने पास तो बहोत धन है। तुझे परदेस जाने की क्या जरुरत है ? लेकिन बेटे के जिद्द करने पर माँ ने परदेस जाने की स्वीकृति देदी । वह कमाने के लिए परदेस चला गया। वह उसे एक सेठ के यहाँ अच्छी नौकरी मिल गयी। कुछ ही समय में वह सारा काम काज सँभालने लग गया। सेठ अपना सारा कारोबार उसे सौंपकर स्वयं तीर्थ यात्रा करने चला गया।
इधर सास ने बहु से कह रखा था की दिये की बुझावे तो चूल्हे की मत बुझाना और चूल्हे की बुझ जावे तो दिये की मत बुझाना। लेकिन एक दिन दोनों अग्नि बुझ गयी तो बहु पड़ोस में अग्नि लेने गयी। उसने वहाँ देखा की पड़ोस की औरते किसी माता का पूजन कर रही है। यह देख कर उसने पूछा आप किस माता का पूजन कर रही हो ? मुझे भी बताओ यह किसका व्रत है तथा इसके करने से क्या फल होता है ? तो उनमे से एक बोली हम चौथ माता का व्रत व पूजन कर रही है। इसके करने से बिछुड़े का मिलन होता है , निपुत्री को पुत्र होता है। इस पर बहु ने कहा की मेरे भी पति को परदेस गए काफी समय हो गया है। मै भी चौथ माता का व्रत करना चाहती हूँ। लेकिन मेरी सास मुझे बाहर आने ही नहीं देती तब मुझे कैसे पता लगेगा की चौथ कब है ? इस पर औरतो ने कहा की तुम रोजाना एक डिबिया में गेहूँ का दाना रखती जाना जिस दिन तीस पुरे हो जावे उस दिन व्रत रख के शाम को चौथ माता की पूजा करके चन्द्रमा को अर्ध्य देकर फिर खाना खा लेना। साहूकार की बहु कहे अनुसार व्रत करने लग गयी। व्रत करते करते काफी समय बीत गया। तो चौथ माता ने सोचा की यदि इसकी नहीं सुनी तो अपने को कोई पूजेगा नहीं तब चौथ माता ने साहूकार के बेटे को सपने में जाकर कहा की साहूकार का बेटा सो रहा है या जाग रहा है ? उसने कहा ना सो रहा हूँ ना जाग रहा हूँ चिंता में पड़ा हूँ। इस पर चौथ माता ने कहा की अब चिंता छोड़ और तेरे घर जाकर सब की सुध ले। उसने कहा की मै कैसे जाऊ मेरा कारोबार बहुत फैला हुआ है। तब चौथ माता बोली की सुबह उठकर नहा धोकर दुकान जाकर चौथ बिंदायक जी का नाम लेकर घी का दीपक जलाना तेरा सारा काम सुलझ जायेगा। सुबह उसने वैसा ही किया देखते ही देखते सारा हिसाब किताब हो गया और उसने घर जाने की तैयारी कर ली। घर को रवाना हुआ तो रास्ते में एक सांप जा रहा था तो उसने सांप को सिसकार दिया। सांप ने गुस्से में आकर कहा की मै तो अपनी सौ साल की उम्र पूरी करके मुक्ति पाने जा रहा था। तूने बाधा डालदी , अब मै तुझे डसूंगा। इस पर साहूकार के बेटे ने कहा की मै बारह साल से मेरी माँ व पत्नी से मिलने जा रहा हूँ। उनसे मिलने के बाद मुझे डस लेना। तब सांप बोला की तू घर जाकर पलंग पर सो जायेगा तब उसने कहा की मै अपनी पत्नी की चोटी निचे लटका दूंगा। उस पर चढ़कर आ जाना। घर पंहुचा तो वह उदास था। बेटा कुछ बोला नहीं लेकिन उसकी पत्नी होसियार थी उसने सब बात पता करके उसने कमरे की एक सीढ़ी पर दूध , दूसरी पर चूरमा , बालू , रेत , इत्र , फूल आदि सात सीढ़ियों में सात वस्तु रख दी। आधी रात को फुफकारता हुआ सांप आया और सभी वस्तुओ का आनंद लेकर खुश लेकिन वचनो से बंधा हुआ था तो डसना तो था। तब चौथ माता और बिंदायकजी ने सोचा की इसकी रक्षा नहीं की तो कलयुग में अपने को कौन पूजेगा ? चौथ माता तलवार बनी और बिंदायकजी ढाल बने। और जैसे ही सांप डसने लगा तो उसे मार दिया। साहूकार के बेटे को नींद नहीं आ रही थी। सांप के मरते ही उसने अपनी पत्नी को उठाया और चौपड़ पासे खेलने लगा। सुबह देर तक बेटा बहु उठे नहीं तो माँ ने कहा बेटा तो थका हुआ है पर बहु क्यों नहीं उठी ? जाकर देखा तो खून ही खून हो रहा था। सास चिल्लाई मेरे बेटे बहु को किसी ने मार दिया। तब अंदर से बेटा बोला माँ हमारा बेरी दुश्मन मरा है। यहाँ सफाई कराओ तब हम बाहर आएंगे। माँ ने वहाँ सफाई करवाई वे बाहर आये। निचे आकर उसने माँ से पूछा माँ मेरे पीछे किसी ने कोई धर्म किया क्या ? तो बहु बोली की – हां मैंने किया , इस पर सास ने कहा की तूने क्या किया ? तुझे में रोज चार समय का खाना देती थी। तब बहु बोली की मै महीने में एक चौथ का व्रत करती थी। सुबह का खाना पानी वाली को देती थी। दूसरी बार का गाय के बछड़े को खिलाती थी तीसरी बार का उठियाना में गाड़ देती थी व चौथी बार का मै पूजा करके चन्द्रमा देख कर फिर खाती थी। मैंने पूजा के लिए बनिया की दुकान से गुड़ मंगवाया सो उसका जाकर हिसाब करो। सास ने पानी वाली से पूछा तो उसने कहा की हां महीने में एक दिन मुझे रोटी देती थी। बछड़े से पूछा तो उसके मुँह से फूल गिरे। उठियाना खोदा तो रोटी के सोने के चक्कर निकले। बनिए से पूछा तो उसने भी कहा की महीने में एक बार मेरे से घी गुड़ मंगवाती थी। फिर बहु ने कहा की मुझे अब वैशाख की चौथ का उद्यापन करना है। सास बहु ने चौथ माता का व्रत व उद्यापन धूमधाम से किया और आराम से जीवन बिताया। है चौथ माता उस पर प्रसन्न हुई जैसी सब पर प्रसन्न होना और सभी की मनोकामना पूरी करना। अमर सुहाग देना।इसके बाद विनायक जी की कहानी केहनी है |

विनायक जी की कहानी – Vinayak ji kahani – Ganesh ji ki Kahani

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